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संत नामदेव महाराज की जीवनी हिंदी में

संत नामदेव महाराज की जीवनी हिंदी में

Saint Namdev Maharaj Biography In Hindi


संत नामदेव महाराज की जीवनी हिंदी में - Saint Namdev Maharaj Biography In Hindi

" Namdev Ji Biography In Hindi "


दोस्तों आज हम आपके साथ महाराष्ट्र के प्रमुख संत, संत शिरोमणि श्री नामदेवजी की जीवनी पेश कर रहे हैं। नामदेव जी उन प्रमुख संतो में से एक है जिनकी भक्ति और अध्यात्म का प्रसार विश्वभर में फैली हुई हैं।
दोस्तों संत नामदेव जी की ख्याति के वो परमपुरुष हैं जिन्होंने अपनी भक्ति के दम पर अपने ईश्वर को प्रसाद खाने पर भी विवश कर दिया। इनकी पूरी जीवनी आप आगे पढ़ सकते हैं-

श्री नामदेव जी भारत के प्रसिद्ध संत हैं। विश्व भर में उनकी पहचान "संत शिरोमणि" के रूप में जानी जाती है. इनके समय में नाथ और महानुभाव पंथों का महाराष्ट्र में प्रचार था।

संत शिरोमणि श्री नामदेवजी का जन्म "पंढरपुर", मराठवाड़ा, महाराष्ट्र (भारत) में "26 अक्टूबर, 1270 , कार्तिक शुक्ल एकादशी संवत् 1327, रविवार" को सूर्योदय के समय हुआ था. महाराष्ट्र के सातारा जिले में कृष्णा नदी के किनारे बसा "नरसी बामणी गाँव, जिला परभणी उनका पैतृक गांव है." संत शिरोमणि श्री नामदेव जी का जन्म "शिम्पी" (मराठी) , जिसे राजस्थान में "छीपा" भी कहते है, परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम दामाशेठ और माता का नाम गोणाई (गोणा बाई) था। इनका परिवार भगवान विट्ठल का परम भक्त था। नामदेवजी का विवाह कल्याण निवासी राजाई (राजा बाई) के साथ हुआ था और इनके चार पुत्र व पुत्रवधु यथा "नारायण - लाड़ाबाई", "विट्ठल - गोडाबाई", "महादेव - येसाबाई" , व "गोविन्द - साखराबाई" तथा एक पुत्री थी जिनका नाम लिम्बाबाई था. श्री नामदेव जी की बड़ी बहन का नाम आऊबाई था. उनके एक पौत्र का नाम मुकुन्द व उनकी दासी का नाम "संत जनाबाई" था, जो संत नामदेवजी के जन्म के पहले से ही दामाशेठ के घर पर ही रहती थी. संत शिरोमणि श्री नामदेवजी के नानाजी का नाम गोमाजी और नानीजी का नाम उमाबाई था.

संत नामदेवजी ने विसोबा खेचर को गुरु के रूप में स्वीकार किया था। विसोबा खेचर का जन्म स्थान पैठण था, जो पंढरपुर से पचास कोस दूर "ओंढ्या नागनाथ" नामक प्राचीन शिव क्षेत्र में हैं. इसी मंदिर में इन्होंने संत शिरोमणि श्री नामदेवजी को शिक्षा दी और अपना शिष्य बनाया। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे और उम्र में उनसे 5 साल बड़े थे। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, संत निवृत्तिनाथ, संत सोपानदेव इनकी बहिन बहिन मुक्ताबाई व अन्य समकालीन संतों के साथ पूरे महाराष्ट्र के साथ उत्तर भारत का भ्रमण कर "अभंग"(भक्ति-गीत) रचे और जनता जनार्दन को समता और प्रभु-भक्ति का पाठ पढ़ाया। संत ज्ञानेश्वर के परलोकगमन के बाद दूसरे साथी संतों के साथ इन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। इन्होंने मराठी के साथ साथ हिन्दी में भी रचनाएँ लिखीं। इन्होंने अठारह वर्षो तक पंजाब में भगवन्नाम का प्रचार किया। अभी भी इनकी कुछ रचनाएँ सिक्खों की धार्मिक पुस्तक " गुरू ग्रंथ साहिब" में मिलती हैं . इसमें संत नामदेवजी के 61पद संग्रहित हैं। आज भी इनके रचित अभंग पूरे महाराष्ट्र में भक्ति और प्रेम के साथ गाए जाते हैं। ये संवत 1407 में समाधि में लीन हो गए।

सन्त नामदेवजी के समय में नाथ और महानुभाव पंथों का महाराष्ट्र में प्रचार था। नाथ पंथ "अलख निरंजन" की योगपरक साधना का समर्थक तथा बाह्याडंबरों का विरोधी था और महानुभाव पंथ वैदिक कर्मकांड तथा बहुदेवोपासना का विरोधी होते हुए भी मूर्तिपूजा को सर्वथा निषिद्ध नहीं मानता था। इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र में पंढरपुर के "विठोबा" की उपासना भी प्रचलित थी। संत नामदेवजी पंढ़रपुर में वारी प्रथा शुरू करवाने के जनक हैं. इनके द्वारा शुरू की गई प्रथा अंतर्गत आज भी सामान्य जनता प्रतिवर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी को उनके दर्शनों के लिए पंढरपुर की "वारी" (यात्रा) किया करती थी (यह प्रथा आज भी प्रचलित है), इस प्रकार की वारी (यात्रा) करनेवाले "वारकरी" कहलाते हैं। विट्ठलोपासना का यह "पंथ" "वारकरी" संप्रदाय कहलाता है। श्री नामदेव इसी संप्रदाय के प्रमुख संत माने जाते हैं।

नामदेव जी के जन्म पर विवाद ~

वारकरी संत नामदेव के समय के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। मतभेद का कारण यह है कि महाराष्ट्र में नामदेव नामक पाँच संत हो गए हैं और उन सब ने थोड़ी बहुत "अभंग" और पदरचना की है। आवटे की "सकल संतगाथा" में नामदेव के नाम पर 2500 अभंग मिलते हैं। लगभग 600 अभंगों में केवल नामदेव या "नामा" की छाप है और शेष में "विष्णुदासनामा" की।

कुछ विद्वानों के मत से दोनों "नामा" एक ही हैं। विष्णु (विठोबा) के दास होने से नामदेव ने ही संभवत: अपने को विष्णुदास "नामा" कहना प्रारंभ कर दिया हो। इस संबध में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध इतिहासकार वि. का. राजवाड़े का कथन है कि "नाभा" शिंपी (छीपा) का काल शके 1192 से 1272 तक है। विष्णुदासनामा का समय शके 1517 है। यह एकनाथ के समकालीन थे। प्रो॰ रानाडे ने भी राजवाड़े के मत का समर्थन किया है। श्री राजवाड़े ने विष्णुदास नामा की "बावन अक्षरी" प्रकाशित की है जिसमें "नामदेवराय" की वंदना की गई है। इससे भी सिद्ध होता है कि ये दोनों व्यक्ति भिन्न हैं और भिन्न भिन्न समय में हुए हैं। चांदोरकर ने महानुभावी "नेमदेव" को भी वारकरी नामदेव के साथ जोड़ दिया है। परंतु डॉ॰ तुलपुले का कथन है कि यह भिन्न व्यक्ति है और कोली जाति का है। इसका वारकरी नामदेव से कोई संबंध नहीं है। नामदेव के समसामयिक एक विष्णुदास नामा कवि का और पता चला है पर यह महानुभाव संप्रदाय के हैं। इन्होने महाभारत पर ओवीबद्ध ग्रंथ लिखा है। इसका वारकरी नामदेव से कोई संबध नहीं है।

नामदेव विषयक एक और विवाद है। "गुरु ग्रन्थ साहिब" में नामदेव के 61 पद संगृहीत हैं। महाराष्ट्र के कुछ विवेचकों की धारणा है कि गुरुग्रंथ साहब के 'नामदेव' पंजाबी हैं, महाराष्ट्रीय नहीं। यह हो सकता है, वह महाराष्ट्रीय वारकरी नामदेव का कोई शिष्य रहा हो और उसने अपने गुरु के नाम पर हिन्दी में पद रचना की हो। परंतु महाराष्ट्रीय वारकरी नामदेव ही के हिंदी पद गुरुग्रंथसाहब में संकलित हैं क्योंकि नामदेव के मराठी अभंगों और गुरुग्रंथसाहब के पदों में जीवन घटनाओं तथा भावों, यहाँ तक कि रूपक और उपमाओं की समानता है। अत: मराठी अभंगकार नामदेव और हिंदी पदकार नामदेव एक ही सिद्ध होते हैं।

महाराष्ट्रीय विद्वान् वारकरी नामदेव जी को ज्ञानेश्वर का समसामयिक मानते हैं और ज्ञानेश्वर का समय उनके ग्रंथ "ज्ञानेश्वरी" से प्रमाणित हो जाता है। ज्ञानेश्वरी में उसका रचनाकाल "1212 शके" दिया हुआ है। डॉ॰ मोहनसिंह दीवाना नामदेव के काल को खींचकर 14वीं और 15वीं शताब्दी तक ले जाते हैं। परंतु उन्होंने अपने मतसमर्थन का कोई अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। नामदेव की एक प्रसिद्ध रचना "तीर्थावली" है जिसकी प्रामाणिकता निर्विवाद है। उसमें ज्ञानदेव और नामदेव की सहयात्राओं का वर्णन है। अत: ज्ञानदेव और नामदेव का समकालीन होना अत: साक्ष्य से भी सिद्ध है। नामदेव, ज्ञानेश्वर की समाधि के लगभग 55 वर्ष बाद तक और जीवित रहे। इस प्रकार नामदेव का काल शके 1192 से शके 1272 तक माना जाता है।

नामदेव जी का जीवनचरित्र ~

नामदेवजी का जन्म पैतृक गाँव नरसी ब्राह्मणी नामक ग्राम के मूलनिवासी दामा शेठ "शिम्पी" (मराठी में) जिसे राजस्थान में "छीपा" भी कहते है, के यहाँ पंढ़रपुर में हुआ था। वहीं इनकी ज्ञानेश्वरजी से भेंट हुई और उनकी प्रेरणा से इन्होंने नाथपंथी विसोबा खेचर से दीक्षा ली। जो नामदेव पंढरपुर के "विट्ठल" की प्रतिमा में ही भगवान को देखते थे, वे खेचर के संपर्क में आने के बाद उसे सर्वत्र अनुभव करने लगे। उनको प्रेमाभक्ति में ज्ञान का समावेश हो गया। डॉ॰ मोहनसिंह, "नामदेव" को रामानंद का शिष्य बतलाते हैं। परन्तु महाराष्ट्र में इनकी बहुमान्य गुरु परंपरा इस प्रकार है -

ज्ञानेश्वर जी और नामदेव जी ने उत्तर भारत की साथ-साथ यात्रा की थी। ज्ञानेश्वर मारवाड़ में कोलायत (बीकानेर) नामक स्थान तक ही नामदेव जी के साथ गए थे । वहाँ से लौटकर उन्होंने आळंदी में शके 1218 में समाधि ले ली। ज्ञानेश्वर के वियोग से नामदेवजी का मन महाराष्ट्र से उचट गया और ये पंजाब की ओर चले गए। गुरुदासपुर जिले के घुमान नामक स्थान पर आज भी नामदेव जी का मंदिर विद्यमान है। वहाँ सीमित क्षेत्र में इनका "पंथ" भी चल रहा है। संतों के जीवन के साथ कतिपय चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी रहती है। नामदेव के चरित्र में भी सुल्तान की आज्ञा से इनका मृत गाय को जिलाना, पूर्वाभिमुख आवढ्या नागनाथ मंदिर के सामने कीर्तन करने पर पुजारी के आपत्ति उठाने के उपरांत इनके पश्चिम की ओर जाते ही उसके द्वार का पश्चिमाभिमुख हो जाना,(ऐसी ही घटना राजस्थान के पाली जिले में मारवाड़ के पास "बारसा" नामक गाँव में कृष्ण भगवान जिन्हें स्थानीय लोग भगवान जगमोहनजी कहते हैं, के पौराणिक मंदिर की घटना का वृतांत भी मिलता हैं. इसका उल्लेख हंसनिर्वाणी संत मोहनानंदजी महाराज द्वारा अपने हस्तलिखित पुस्तक में किया हैं, जिस पर शोध कर पाली के गुड़ाएन्दला गाँव निवासी श्री अशोक आर.गहलोत, अहमदाबाद ने सैद्धांतिक व प्रायोगिक प्रमाणों के साथ सन् 2003 में उजागर किया. जहां "नामदेव भक्ति संप्रदाय संघ" के प्रणेता ह.भ.प. श्री रामकृष्ण जगन्नाथ बगाडे महाराज, पुणे ने राष्ट्रीय स्तर का अधिवेशन कर इस स्थान की पुष्टि सन् 2005 में की) विट्ठल की मूर्ति का इनके हाथ दुग्धपान करना, आदि घटनाएँ समाविष्ट हैं। महाराष्ट्र के पंढरपुर स्थित विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर शके 1272 में परिवार के एक सदस्य(बेटे की बहु) को छोड़कर संजीवन समाधि ले ली। कुछ विद्वान् इनका समाधिस्थान घुमान मानते हैं, परंतु बहुमत पंढरपुर के ही पक्ष में हैं।

संत नामदेव जी की यात्रायों के समय उनके साथ श्री निवृत्तिनाथ , श्री सोपानदेव, श्री ज्ञानेश्वर , बहिन मुक्ताबाई , श्री चोखा मेला (नामदेवजी के शिष्य - जाती से धेड़ - गांव मंगलवेढा), सांवता माली (गांव - आरण मेंढी), नरहरि सुनार (गांव - पंढरपुर) थे. संत शिरोमणि के प्रधान शिष्यो में संत जनाबाई (जो दामाशेठ के घर सेविका थी), परिसा भागवत (जिन्होंने प्रथम दीक्षा ग्रहण की थी), चोखामेला, केशव कलाधारी, लड्ढा, बोहरदास , जल्लो, विष्णुस्वामी, त्रिलोचन आदि थे , जिनके सामीप्य में उनके जीवन काल में भक्ति रस की सरिता बह निकली, जो आज भी अनवरत जारी है.

संत नामदेवजी घुमान (पंजाब) प्रवास के समय अपनी मण्डली के साथ मारवाड़ जंक्शन के पास "बारसा" गांव स्थित कृष्ण मंदिर, भगवान जगमोहनजी के मंदिर में रात्रि विश्राम के लिए रुके थे. जहां संत मंडली ने रात में विट्ठल का कीर्तन शुरू किया था. संत नामदेव अपने प्रभू श्री विट्ठल के साथ इस कदर कीर्तन में तल्लीन हो गए कि कब भौर हुई पता ही नहीं चला. प्रातःकाल मंदिर के ब्राह्मण पुजारी पूजा के लिए मंदिर प्रवेश कर रहे तो उन्हें पता चला कि कोई मराठी संत मंदिर के अहाते में नाच रहा हैं. मंदिर प्रवेश के लिए रास्ता नहीं मिला तो पुजारी ने गुस्से से नामदेव जी को प्रताडित कर मंदिर के पीछे जाकर अपना कीर्तन करने का आदेश दे दिया तो वे मंदिर के पीछे बैठकर दुःखी व अपमानित महसूस कर अपने आराध्य कृष्ण से करूणामयी पुकार से कीर्तन करने लगे. भक्त के आर्तनाद को महसूस कर प्रभू जगमोहनजी ने अपने पूरे मंदिर को ही पूर्व से पश्चिम की ओर घुमा दिया जहां उसका परम भक्त बैठा था. जिसका प्रमाण आज भी इस मंदिर में मौजूद हैं. जहां भक्त नामदेव व भगवान कृष्ण(जगमोहनजी) एक ही आधार पर समकक्ष बिराजमान हैं. ऐसा अनोखा दृश्य इतिहास में कहीं नहीं मिलता, जैसा आज के "बारसाधाम" (मारवाड़ जंक्शन) राजस्थान में है. भगवान जगमोहनजी (ठाकुरजी) ने अपने प्रिय भक्त श्री नामदेव जी को सम्पूर्ण मंदिर सहित घूमकर दर्शन दिए. इस स्थल पर शोध करने वाले छीपा अशोक आर. गहलोत, गुड़ाएन्दला ने इसे सन् 2004 में "राजस्थान का पंढ़रपुर" बारसाधाम नाम दिया, जिसे संत ह.भ.प. रामकृष्ण बगाडे जी ने सन् 2005 में अपने कार्यक्रम में इस नाम पर मोहर लगाई. आज ये स्थान "राजस्थान का पंढरपुर" कहा जाता है. इस बात की पुष्टि इतिहासविद और बारसाधाम के खोजी छीपा श्री अशोक आर गहलोत ने भी समय समय पर छीपा जाति को अवगत कराई है.

नामदेव जी के मत और साहित्यक देन ~

बिसोबा खेचर से दीक्षा लेने के पूर्व तक ये सगुणोपासक थे। पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की उपासना किया करते थे। दीक्षा के उपरांत इनकी विट्ठलभक्ति सर्वव्यापक हो गई। महाराष्ट्रीय संत परंपरा के अनुसार इनकी निर्गुण भक्ति थी, जिसमें सगुण निर्गुण का काई भेदभाव नहीं था। उन्होंने मराठी में कई सौ अभंग और हिंदी में सौ के लगभग पद रचे हैं। इनके पदों में हठयोग की कुंडलिनी-योग-साधना और प्रेमाभक्ति की (अपने "राम" से मिलने की) "तालाबेली" (विह्वलभावना) दोनों हैं। निर्गुणी कबीर के समान नामदेव में भी व्रत, तीर्थ आदि बाह्याडंबर के प्रति उपेक्षा तथा भगवन्नाम एवं सतगुरु के प्रति आदर भाव विद्यमान है। कबीर के पदों में यत्र-तत्र नामदेव की भावछाया दृष्टिगोचर होती है। कबीर से पूर्व नामदेव ने उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का प्रचार किया, जो निर्विवाद है।
नामदेव जी ने जो बाणी उच्चारण की वह गुरुग्रंथ साहिब में भी मिलती है। बहुत सारी वाणी दक्षिण व महाराष्ट्र में गाई जाती है। इनकी वाणी पढ़ने से मन को शांति मिलती है व भक्ति की तरफ मन लगता है।

ठाकुर को दूध पिलाना(प्रेरक प्रसंग) ~

एक दिन नामदेव जी के पिता किसी काम से बाहर जा रहे थे। उन्होंने नामदेव जी से कहा कि अब उनके स्थान पर वह ठाकुर की सेवा करेंगे जैसे ठाकुर को स्नान कराना, मन्दिर को स्वच्छ रखना व ठाकुर को दूध चढ़ाना। जैसे सारी मर्यादा मैं पूर्ण करता हूँ वैसे तुम भी करना। देखना लापरवाही या आलस्य मत करना नहीं तो ठाकुर जी नाराज हो जाएँगे।

नामदेव जी ने वैसा ही किया जैसे पिताजी समझाकर गए थे। जब उसने दूध का कटोरा भरकर ठाकुर जी के आगे रखा और हाथ जोड़कर बैठा व देखता रहा कि ठाकुर जी किस तरह दूध पीते हैं? ठाकुर ने दूध कहाँ पीना था? वह तो पत्थर की मूर्ति थे। नामदेव को इस बात का पता नहीं था कि ठाकुर को चम्मच भरकर दूध लगाया जाता व शेष दूध पंडित पी जाते थे। उन्होंने बिनती करनी शुरू की हे प्रभु! मैं तो आपका छोटा सा सेवक हूँ, दूध लेकर आया हूँ कृपा करके इसे ग्रहण कीजिए। भक्त ने अपनी बेचैनी इस प्रकार प्रगट की -

हे प्रभु! यह दूध मैं कपला गाय से दोह कर लाया हूँ। हे मेरे गोबिंद! यदि आप दूध पी लेंगे तो मेरा मन शांत हो जाएगा नहीं तो पिताजी नाराज़ होंगे। सोने की कटोरी मैंने आपके आगे रखी है। पीए! अवश्य पीए! मैंने कोई पाप नहीं किया। यदि मेरे पिताजी से प्रतिदिन दूध पीते हो तो मुझसे आप क्यों नहीं ले रहे? हे प्रभु! दया करें। पिताजी मुझे पहले ही बुरा व निकम्मा समझते हैं। यदि आज आपने दूध न पिया तो मेरी खैर नहीं। पिताजी मुझे घर से बाहर निकाल देंगे।

जो कार्य नामदेव के पिता सारी उम्र न कर सके वह कार्य नामदेव ने कर दिया। उस मासूम बच्चे को पंडितो की बईमानी का पता नहीं था। वह ठाकुर जी के आगे मिन्नतें करता रहा। अन्त में प्रभु भक्त की भक्ति पर खिंचे हुए आ गए। पत्थर की मूर्ति द्वारा हँसे। नामदेव ने इसका जिक्र इस प्रकार किया है -

ऐकु भगतु मेरे हिरदे बसै ।
नामे देखि नराइनु हसै ॥ (पन्ना 1163)
एक भक्त प्रभु के ह्रदय में बस गया। नामदेव को देखकर प्रभु हँस पड़े। हँस कर उन्होंने दोनों हाथ आगे बढाएं और दूध पी लिया। दूध पीकर मूर्ति फिर वैसी ही हो गई।

दूधु पीआई भगतु घरि गइआ ।
नामे हरि का दरसनु भइआ ॥ (पन्ना 1163 - 64)
दूध पिलाकर नामदेव जी घर चले गए। इस प्रकार प्रभु ने उनको साक्षात दर्शन दिए। यह नामदेव की भक्ति मार्ग पर प्रथम जीत थी।

शुद्ध ह्रदय से की हुई प्रर्थना से उनके पास शक्तियाँ आ गई। वह भक्ति भव वाले हो गए और जो वचन मुँह निकलते वही सत्य होते। जब आपके पिताजी को यह ज्ञान हुआ कि आपने ठाकुर में जान डाल दी व दूध पिलाया तो वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने समझा उनकी कुल सफल हो गई है।

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बच्चो को मजबूती देता हैं योग - अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

बच्चो को मजबूती देता हैं योग - अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

The benefits of yoga for kids and teens in hindi

बच्चो को मजबूती देता हैं योग ~ The Benefits Of YOGA For Kids And Teens In Hindi
'' Baccho Ko Majbuti Deta He Yoga'

दोस्तों आज अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस हैं, इस दिन भारत के साथ-2 पूरी दुनिया एक साथ योग करेगी, और अपने सेहत के लिए एक कदम आगे बढ़ाएगी। हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की पहल से पूरा संसार 21 जून के दिन International Yoga दिवस मनाता हैं।

योग पूरी दुनिया को भारत की तरफ से सेहत का एक ऐसा तोहफा है जो इंसान को लम्बा और स्वस्थ जीवन देता हैं। हम तो योग के फायदे जानते ही हैं और उनको करते भी है पर आज हम आपके लिए बताएँगे की योग आपके बच्चो के लिए कितने ख़ास और लाभदायक हो सकते है। न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक तौर पर योग बच्चो को कैसे मदद करता हैं। ये सब आप पढ़ेंगे हमारे इस आर्टिकल में-

दोस्तों पढ़ने वाले बच्चे अक्सर स्कूल, कॉलेज, कोचिंग या स्टडी टेबल पर अपना ज्यादा समय बिताते हैं।ऐसे में उनकी अन्य गतिविधिया कम हो जाती हैं जिसमे उनके मोटापा, आलस, तनाव और चिड़चिड़ेपन जैसी काफी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। दोस्तों योग विशेषज्ञों की माने तो जो बच्चे योग करते हैं, वे स्वस्थ रहने के साथ- साथ एक्टिव बनते हैं। इससे उनमे ऊर्जा व एकाग्रता का स्तर बढ़ता हैं परिणामस्वरूप वो अपनी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।


1. थोड़ी देर टहल आएं ~ 

अक्सर बच्चों को पढाई के दौरान आलस और थकन महसूस होती है। ऐसे में आमतौर पर बच्चो को मैडिटेशन या ध्यान लगाने की सलाह दी जाती हैं, पर इससे बच्चो को नींद आने लगती हैं। माता-पिता को चाहिए की वे बच्चो को पढाई के बाद 25-30 मिनट बाद थोड़ी देर टहलने और लम्बी सांस लेने व छोड़ने की प्रक्रिया करने की सलाह दें।

2. आँखों को भी दें आराम ~

दोस्तों त्राटक योग में, आँखों को दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे, गोलाकार घुमाना, क्लॉकबाईज़-एंटीक्लॉकबाईज़ आदि गतिविधियां एक बार में 5-10 बार दोहरा सकते हैं। साथ ही आँखों की थकान, जलन व पानी आने की समस्या हो तो थोड़ी-थोड़ी देर में आँखों को पानी से धोएं। त्राटक से आपके बच्चो की आँखों से स्ट्रेस भी कम होगा।

3.गर्दन को गोलाकार घुमाएं ~

दोस्तों बच्चो के पढ़ते समय बैठे रहने से दर्द में दर्द व अकड़न की समस्या भी कभी - कभार हो जाती हैं, तो इसके लिए गर्दन को दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे, गोलाकार घुमाने जैसा व्यायाम कर सकते हैं। बैठे- बैठे ही बच्चो को कंधो को गोल घुमाने के लिए कहें, इससे गर्दन व कंधो से जुडी नसों को रहत मिलेगी।

4.पाचनक्रिया सही बनाएं ~

दोस्तों पढाई करने, गेम्स खेलने या मोबाइल फ़ोन में काम करने के दौरान के ही जगह पर बैठे रहने से बच्चो में पेट व कमर से जुडी परेशानिया होने लगती हैं। ऐसे में कपालभाति, भस्त्रिका आदि कर करने की सीख अपने बच्चो को दें सकते हैं। इसके अलावा बीच-बीच में थोड़ी-थोड़ी देर पवनमुक्तासन, भुजंगासन, ताड़ासन जैसे योग करने से पाचनक्रिया सही रहेगी और शरीर में लचीलापन आएगा। ये सब क्रियाएं 5-5 मिनट के लिए करें।

5.स्वभाव में बदलाव ~

दोस्तों अक्सर 10-12 साल की उम्र के बाद से बच्चो के हार्मोन्स में बदलाव आने से स्वभाव भी बदलने लगता है जैसे छोटी-छोटी बातो पर गुस्सा होना, चिड़चिड़ापन, भूख कम लगना, आदि। ऐसे में खाटू - प्रणाम, तितलिआसन, ताड़ासन, पश्चिमोतासन, वृक्षासन, भ्रामरी लाभदायक होते हैं। आप इन सब योगों के बारे में इंटरनेट पर आराम से पढ़ सकते है और इनके फायदों के बारे में और जान सकते है।

6.बालों और मोटापे की समस्या ~

दोस्तों कम उम्र में पढाई के तनाव, शारीरिक गतिविधियों के अभाव और असंतुलित आहार लेने से बच्चो में बाल झड़ने व सफ़ेद होने की समस्या होने लगी है। ऐसे में शीर्षासन, शंशाकासन और पश्चिमोत्तासन व नाड़ीशोधन प्राणायम से दिमाग का रक्त संचार बेहतर होता हैं।

सूर्य नमस्कार, कपालभाति, पवनमुक्तासान, वज्रासन, शंशाकासन आदि से भोजन आसानी से पचता है और कमर के आस-पास चर्बी नहीं बढ़ती। इनसे आपके बच्चो को कभी भी आगे समय में मोटापे का शिकार नहीं होना होगा।


7.फेफड़ों से सुधरेंगे श्वास- पृश्वास ~

दोस्तों आज की इस प्रदूषित समय में जहा वातावरण पर प्रदुषण ने इतना Negative प्रभाव डाला है, वहाँ कम उम्र में ही बच्चो को सांस संबंधी दिक्कतें होने लगती है। जिसका एक मुख्य कारण ये भी हैं की बच्चे ज्यादातर समय बंद कमरों में बिताते है। इसलिए माता-पिता, बच्चो को श्वास- पृश्वास (लम्बी गहरी साँसे) क्रिया काम के बीच-बीच में करवाएं। नाड़ीशोधन  प्राणायम व का उच्चारण भी फेफड़ों की कार्यक्षमता सुधारता हैं।


दोस्तों विहार के साथ-साथ बच्चो के आहार में भी सुधार करने की जरुरत होती हैं। बच्चो को मौसमी व ताजा फलों के साथ अंकुरित अनाज खाने को दें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत डालें। बच्चो को एक ही समय में भरप्लेट खाना न दें, इसके बजाय भोजन को 5-6 बार करके दें । इससे उनकी भूख शांत होगी और शरीर को जरुरत के अनुसार ऊर्जा और पौष्टिकता मिलेगी।

दोस्तों उम्मीद है हमारे आज के इस आर्टिकल से आपको बहुत फायदा होगा। और आप सभी को ज्ञानबाज़ार के फाउंडर जुगनू नागर की और से विश्व योग दिवस की शुभकामनाएं। आशा करते है इस योग दिवस के द्वारा आपके शारीरिक और मानसिक स्वस्थ तो को बहुत लाभ पहुंचेगा।

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फादर्स डे पर अनमोल कथन और विचार- Happy Father's Day

फादर्स डे पर अनमोल कथन और विचार- Happy Father's Day

happy father's day best quotes in hindi


फादर्स डे पर अनमोल कथन और विचार ~ Happy Father's Day Best Quotes And Sayings In Hindi

1. My father gave me the greatest gift anyone could give another person, he believed in me.

मेरे पिता ने मुझे सबसे बड़ा उपहार दिया जो किसी अन्य व्यक्ति को दे सकता था, वह मुझ पर विश्वास करते थे।

जिम वल्वानो Jim Valvano
2.Anyone can be a father, but it takes someone special to be a dad, and that's why I call you dad, because you are so special to me. You taught me the game and you taught me how to play it right.

कोई भी पिता हो सकता है, लेकिन किसी विशेष को ही डैड बनने के लिए ले जाता है, और यही कारण है कि मैं आपको पिता कहता हूं, क्योंकि आप मेरे लिए बहुत खास हैं आपने मुझे खेल सिखाया है और आपने मुझे सिखाया है कि इसे सही कैसे खेलना है।

वेड बॉग्स Wade Boggs
3.When a father gives to his son, both laugh; when a son gives to his father, both cry.

जब एक पिता अपने पुत्र को देता है तो दोनों हँसते हैं; जब एक पुत्र पिता को देता है तो दोनों रोते हैं.
विलियम शेक्सपियर William Shakespeare
4. A father is a man who expects his son to be as good a man as he meant to be.
एक पिता एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने बेटे से अपेक्षा करता है कि वह एक व्यक्ति के रूप में अच्छा होगा क्योंकि वह होना चाहिए।
-  फ्रैंक . क्लार्क Frank A. Clark
5. A real man loves his wife, and places his family as the most important thing in life. Nothing has brought me more peace and content in life than simply being a good husband and father.

एक असली आदमी अपनी पत्नी को प्यार करता है, और अपने परिवार को जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज के रूप में रखता है। सिर्फ एक अच्छे पति और पिता होने के मुकाबले मुझे जीवन में शांति और संतुष्टि नहीं मिली है
-  फ्रैंक अबागनले Frank Abagnale
5.Being a father has been, without a doubt, my greatest source of achievement, pride and inspiration. Fatherhood has taught me about unconditional love, reinforced the importance of giving back and taught me how to be a better person.

एक पिता होने के नाते, उपलब्धि, गौरव और प्रेरणा का बिना किसी संदेह के मेरा सबसे बड़ा स्रोत है। पितृभाव ने मुझे बिना शर्त प्यार के बारे में सिखाया है, वापस देने के महत्व को मजबूत बनाया और मुझे सिखाया कि कैसे एक बेहतर व्यक्ति बनना है।

नवीन जैन Naveen Jain
6. It is a wise father that knows his own child.
वो पिता बुद्धिमान है जो अपनी संतान को जानता है.
विलियम शेक्सपियर William Shakespeare
7. My father used to say that it's never too late to do anything you wanted to do. And he said, 'You never know what you can accomplish until you try.'
मेरे पिता कहते थे कि ऐसा कुछ करने में कभी देर नहीं होती जो आप करना चाहते हो। और उन्होंने कहा, 'आप कभी यह नहीं जान सकते की आप क्या कर सकते हो जब तक आप कोशिश नहीं करते।'
-माइकल जॉर्डन Michael Jordan
8. One father is more than a hundred schoolmasters. 
एक पिता 100 से ज्यादा अध्यापको से बड़ा होता हैं।
जॉर्ज हर्बर्ट George Herbert 
9. To a father growing old nothing is dearer than a daughter.

एक बूढ़े होते पिता के लिए पुत्री से ज्यादा कोई भी चीज प्यारी नहीं होती।

यूरिपिडिस Euripides

10. My father was my teacher. But most importantly he was a great dad. 
मेरे पिता मेरे शिक्षक थे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह एक महान पिता थे।
बीयू ब्रिड्जस Beau Bridges
11. I cannot think of any need in childhood as strong as the need for a father's protection.

मैं  बचपन में एक  पिता  के  संरक्षण  के  जितना  किसी  और  ज़रुरत  के बारे  में  नहीं  सोच  सकता.

सिगमंड  फ्रायड Sigmund Freud

12. The most important thing a father can do for his children is to love their mother.

सबसे महत्वपूर्ण काम जो एक पिता अपने बच्चे के लिए कर सकता है, उसकी माँ से प्यार।
थिओडोर हेस्बूरह Theodore Hesburgh
13. I imagine God to be like my father. My father was always the voice of certainty in my life. Certainty in the wisdom, certainty in the path, certainty always in God. For me God is certainty in everything. Certainty that everything is good and everything is God.

मैं कल्पना करता हूं कि भगवान को मेरे पिता की तरह होना चाहिए। मेरे पिता हमेशा मेरी ज़िंदगी में निश्चितता की आवाज करते थे। ज्ञान में निश्चितता, पथ में निश्चितता, हमेशा भगवान में निश्चितता है मेरे लिए भगवान सब कुछ में निश्चित है निश्चित है कि सबकुछ अच्छा है और सबकुछ परमेश्वर है।

येहूदा बर्ग Yehuda Berg

14. My father didn't tell me how to live; he lived, and let me watch him do it.

मेरे  पिता  ने  मुझसे  ये  नहीं  कहा  कि तुम  कैसे  जियो ; वो  जिए , और मुझे  उन्हें   ये  करते  हुए  देखने  दिया.
क्लारेंस बुडिंग्टन केलैंड Clarence Budington Kelland

15. I try to live my life like my father lives his. He always takes care of everyone else first. He won't even start eating until he's sure everyone else in the family has started eating. Another thing: My dad never judges me by whether I win or lose.

मैं अपनी जिंदगी अपने पिताजी कि जिंदगी के जैसे जीने को कोशिश करता हूँ. वो हमेसा हर किसी की पहले देखभाल करते हैं.वह तब तक खाना शुरू नहीं करते जब तक कि वह यह सुनिश्चित करे कि परिवार में हर कोई खाना खा रहा है।एक और बात: मेरे पिता ने मुझे कभी भी मेरी हार-जीत से नहीं देखा।


बेन रोएथलिसबेर्गेर Ben Roethlisberger

16.Until you have a son of your own... you will never know the joy, the love beyond feeling that resonates in the heart of a father as he looks upon his son.

जब तक आपका कोई बेटा नहीं होता ... आपको उस खुशी का पता नहीं चलेगा, उस भावनाओं से परे प्यार का जो एक पिता के दिल में बसता है जब वह अपने बेटे को देखता है।

-केंट नेरबर्न Kent Nerburn

 17. I am not ashamed to say that no man I ever met was my father's equal, and I never loved any other man as much.

मैं यह कहने में शर्मिन्दा नहीं हूं कि कोई भी आदमी कभी मेरे पिता के समान नहीं था, और मुझे कभी भी किसी और व्यक्ति से ज्यादा प्यार नहीं हुआ।

हेडी लमरर Hedy Lamarr

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